नाटक लेखन ( नाटक लिखने का व्याकरण )

इस लेख में नाटक के व्याकरण रूप का अध्ययन करेंगे। इसके अंतर्गत नाटक किसे कहते हैं ? नाटक के तत्व आदि का विस्तृत रूप से विवरण प्रस्तुत किया गया है।

यह विद्यार्थियों के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है।

इस लेख का अध्ययन कर विद्यार्थी इस विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं , वह नाटक लिखने की कला का भी विकास कर सकते हैं।

नाटक लेखन – नाटक लिखने का व्याकरण

यहां दृश्य काव्य अर्थात नाटक का व्याकरणिक रूप का अध्ययन करेंगे। नाटक दृश्य काव्य भी कहा जाता है। अन्य काव्य तथा साहित्य में पढ़ने सुनने तक का दायरा सीमित रहता है , किंतु इसके अंतर्गत देखने का भी गुण है।

यही कारण है कि इसे रंगमंच का पूरक माना गया है अर्थात नाटक वह साहित्य है जो रंगमंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है , उस का मंचन किया जा सकता है। व्याकरण से हमारा संबंध नाटक के तत्व और उसकी रचना से है।

यहां आप इन्हीं बिंदुओं पर अध्ययन करेंगे।

नाटक किसे कहते है

नाटक एक दृश्य विधा है। इसे हम अन्य गद्य विधाओं से इसलिए अलग नहीं मानते हैं क्योंकि नाटक भी कहानी , उपन्यास , कविता , निबंध आदि की तरह साहित्य के अंतर्गत ही आती है।

पर यह अन्य विधाओं से इसलिए अलग है , क्योंकि वह अपने लिखित रूप से दृश्यता की ओर बढ़ता है।

नाटक केवल अन्य विधाओं की भांति केवल एक आगामी नहीं है।

नाटक का जब तक मंचन नहीं होता तब तक वह संपूर्ण रूप व सफल रूप में प्राप्त नहीं करता है।

अतः कहा जा सकता है कि नाटक को केवल पाठक वर्ग नहीं , दर्शक वर्ग भी प्राप्त होता है।

साहित्य की गद्य विधाएं पढ़ने या फिर सुनाने तक की यात्रा करती है। परंतु नाटक पढ़ने , सुनने और देखने के गुण को भी अपने भीतर रखता है।

नाटक के तत्व या अंग घटक

व्याकरण की दृष्टि से नाटक को एक निश्चित रूप रेखा के अंतर्गत लिखा जाना चाहिए। इसके प्रमुख तत्व तथा घटक निम्नलिखित है –

1 समय का बंधन

नाटक का मंचन सदैव वर्तमान काल में किया जाता है , जिसे एक निश्चित समय के अंतराल पर आरंभ तथा समापन किया जाना चाहिए। नाटककार को समय प्रबंधन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। किसी भी दर्शक के पास समय व्यर्थ करने का आग्रह नहीं होता। अतः वह एक नाटक को देखने अथवा उसे अनुभव करने के लिए बैठता है , ज्यादा अधिक समय लगने से नाटक में बोरियत होती है।

अतः नाटक में समय का बंधन आवश्यक है।

इसके अंतर्गत आरंभ , संघर्ष तथा समापन  तीन प्रमुख स्थितियां आती है। जिसे निश्चित समय के अंतराल पर समाप्त किया जाना चाहिए।

2 शब्द –

शब्दों का चयन नाटक या किसी भी साहित्य को सफल बनाता है। हमें नाटक के अनुसार ही शब्दों का चयन किया जाना चाहिए। जैसे ऐतिहासिक नाटक है तो ऐतिहासिक शब्दों का अर्थात उस समय प्रयोग होने वाले शब्दों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

शब्द नाटक तथा समय के साथ तारतम्यता बैठाने में सहायक होते हैं।

जो दर्शकों को बांधे रखने का एक कारगर उपाय है।

3 कथ्य (कथानक) –

कथानक पूरे नाटक का समग्र रूप होता है। इसके अंतर्गत नाटककार को विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है। क्योंकि नाटक का विषय चयन करते समय उसको उसकी भाषा शैली , परिवेश , वस्त्र-परिधान आदि समस्त रूपों को नाटक में समाहित करना चाहिए नाटककार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके कथानक दुखांतक न हो।

अक्सर देखा गया है जिस नाटक में दुख के क्षणों से नाटक का समापन हुआ है , वह नाटक कभी सफल नहीं हुए हैं।

अतः नाटक की योजना करते समय आरंभ – सुख-दुख किसी भी स्थिति से की जा सकती है।

उसका संघर्ष – सुख के लिए तथा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होना चाहिए।

और अंत में समापन उसके सुख की प्राप्ति तथा लक्ष्य की प्राप्ति से होना चाहिए।

4. संवाद –

नाटककार को नाटक में संवाद पर विशेष ध्यान देना चाहिए। क्योंकि संवाद ही नाटक को सार्थक बनाते हैं। नाटक में संवाद छोटे-छोटे तथा पात्रों के अनुकूल होने चाहिए। किसी ऐसे संस्कृत निष्ठ या क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए जो दर्शकों को बोझिल या समझ में ना आए।

5. द्वंद (प्रतिरोध)

नाटक में द्वंद या प्रतिरोध की स्थिति मध्य में आती है , जब नायक विपरीत परिस्थितियों में घिर जाता है। तथा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करता है। यह स्थिति दर्शकों तक पहुंचने का आदर्श स्थिति होती है। इस समय दर्शक उस पात्र तथा नाटक से सीधा जुड़ जाता है। उस नायक में स्वयं के प्रतिरूप को देखने लगता है

अतः इस स्थिति को रंगमंच पर उपस्थित करने के लिए विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

 

6 चरित्र योजना

कथानक के अनुसार चरित्र योजना की व्यवस्था की जानी चाहिए।

अगर कथानक किसी ग्रामीण परिवेश का है तो उसके पात्रों का चरित्र चित्रण भी ग्रामीण परिवेश के अनुसार ही होना चाहिए। कथानक से अलग हटकर पात्रों का चरित्र चित्रण किया गया तो वह बेमेल होगा। यहां

नाटक के असफल होने की पूरी संभावना रहेगी।

कहने का तात्पर्य है कि

अगर ग्रामीण परिवेश का दृश्य है तो उसमें कृषक या खेती करता हुआ मजदूर आदि को ही दिखाया जाना चाहिए।

ना कि कोई शहरी कोट पैंट पहना व्यक्ति उसमें दिखाया जाए।

 

7. भाषा शिल्प –

भाषा का भी विशेष महत्व होता है , जिस प्रकार का कथानक तैयार किया जाता है

उसी प्रकार की भाषा शैली का भी प्रयोग किया जाना चाहिए।

ग्रामीण परिवेश का दृश्य है या किसी विशेष समाज ,

इतिहास आदि से संबंधित है तो भाषा शैली का भी प्रयोग उसके अनुसार किया जाना चाहिए।

उससे संबंधित भाषा का प्रयोग करने से दर्शक अधिक सुविधाजनक रूप से जुड़ जाते हैं ,

अन्यथा दृश्य काव्य और भाषा आपस में तारतम्यता नहीं बिठा पाते।

नाटककार को चाहिए कि भाषा शिल्प कथानक के अनुरूप तथा पात्रों के अनुरूप रखें।

कोई पढ़ा-लिखा शहरी व्यक्ति है तो उसकी भाषा शैली में पढ़े लिखिए शिक्षित व्यक्ति का परिचय मिलना चाहिए।

अगर कोई अनपढ़ गवार व्यक्ति है तो उसकी शब्दावली वैसी ही होनी चाहिए।

8 ध्वनि योजना –

दृश्य काव्य एक ऐसी साहित्य की विधा है जो दृश्य , श्रव्य तथा पाठ्य तीनों रूपों से संबंधित है।

विशेष रुप से इसमें रंगमंचीता का गुण विद्यमान रहता है।

साहित्यकारों के अनुसार दृश्य काव्य को रंगमंच के अनुरूप माना गया है।

दृश्य काव्य वह है जिसे रंगमंच पर दिखाया जा सके।

इसके लिए विस्तृत ब्यौरा भी प्रस्तुत किया गया है।

रंगमंच कैसा होना चाहिए ?

दर्शकों को बैठने के लिए कैसी व्यवस्था होनी चाहिए ? आदि का साहित्यकरण किया गया है।

साहित्यकारों के अनुसार ध्वनि योजना का प्रबंध नाटक की सफलता तय करता है।

ध्वनि उस व्यक्ति तक भी पहुंचना चाहिए जो पंक्ति में सबसे पीछे बैठा है।

पूर्व समय में ध्वनि योजना का विशेष प्रबंध नहीं हुआ करता था , जिसके कारण पीछे बैठा व्यक्ति दृश्य काव्य के मूल रस को ग्रहण नहीं कर पाता था। किंतु इसका वर्तमान समय में विशेष प्रबंध किया जाता है। ध्वनि विस्तारक के माध्यम से पीछे बैठे व्यक्ति तक स्पष्ट रूप से रंगमंच पर खेले जाने वाले नाटक को देखने तथा सुनने की व्यवस्था की जाती है।

जिसका असर दर्शकों पर पड़ता है , वह अधिक देर तक नाटक से जुड़ा रहता है।

9 प्रकाश योजना –

दृश्य काव्य रंगमंच के लिए होता है। रंगमंच पर इसे खेलते समय प्रकाश की व्यवस्था का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रकाश व्यवस्था के कारण समय परिस्थिति देशकाल को व्यवस्थित रूप से उजागर किया जा सकता है कहीं दुख का क्षण है तो वहां पर अंधेरे की व्यवस्था की जाती है , वही उत्साह आदि का दृश्य रंगमंच पर दिखाया जा रहा है।

तो प्रकाश की व्यवस्था उजाले के रूप में होती है।

दृश्य के अनुसार प्रकाश की व्यवस्था परिवर्तित होती रहती है।

प्रकाश योजक को चाहिए कि दृश्यों के अनुसार व्यवस्था करें।

10 वेशभूषा –

वेशभूषा का नाटक के क्षेत्र में विशेष महत्व होता है। क्योंकि नाटक को दृश्य काव्य भी कहा गया है।

इसे रंगमंच पर खेला जाता है।

इस के पात्रों को उनके अनुरूप ही वेशभूषा धारण करना चाहिए।

अगर कोई जोकर की भूमिका अदा कर रहा है तो उसे उसी प्रकार के वेशभूषा बनाना चाहिए तथा

उसी प्रकार के वस्त्र परिधान को पहनना चाहिए।

अगर कोई सेना या महाराज की भूमिका में है तो उसे उसी के अनुसार वेशभूषा तथा परिधान को पहनना चाहिए।

जिससे दर्शक सुविधाजनक रुप से जुड़ सकें।

11 रंगमंचीयत्ता

साहित्यकारों के अनुसार दृश्य काव्य को रंगमंच के अनुसार होना चाहिए।

वही दृश्य काव्य सफल है जिसे रंगमंच पर खेला तथा दिखाया जा सकता हो।

कुछ साहित्यकारों ने इसे नकारते हुए कहा है रंगमंच को दृश्य काव्य के अनुरूप होना चाहिए।

जयशंकर प्रसाद के अनेकों नाटक ऐसे हैं जो रंगमंच पर दिखाया तथा खेला जाना बेहद कठिन है।

जिन्हें नाटक कहना मुश्किल है।

इस पर जयशंकर प्रसाद की टिप्पणी थी कि रंगमंच को दृश्य काव्य के अनुसार होना चाहिए , दृश्य काव्य को रंगमंच के अनुसार नहीं।

रंगकर्मी की कुशलता इसी बात पर निर्भर करती है कि वह दृश्य काव्य को सुविधाजनक रूप से रंगमंच पर प्रदर्शित कर सके।

किंतु दृश्य काव्य को चारों ओर से देखें तो वह दृश्य काव्य है।

अतः दृश्य काव्य की रचना करते समय नाटककार को चाहिए कि वह रंगमंच के अनुसार ही नाटक की रचना करें।

प्रश्न – ‘समय के बंधन’ का नाटक में क्या महत्व है ?

उत्तर – दृश्य काव्य विधा में समय के बंधन का विशेष महत्व है।

नाटक कार्य को समय बंधन का अपने नाटक में विशेष ध्यान रखना होता है

और इस बात का दृश्य काव्य की रचना पर भी पूरा प्रभाव पड़ता है।

नाटक को शुरू से अंत तक एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा होना होता है।

यदि ऐसा नहीं तो नाटक से प्राप्त होने वाला रस कोतुहल आदि प्राप्त नहीं हो पाता है।

दृश्य काव्य का मंचन हम धारावाहिक के रूप में नहीं दिखा सकते हैं।

नाटककार चाहे अपनी किसी भूतकालीन रचना को ले या किसी अन्य लेखक की रचना को चाहे वह भविष्य काल की हो

वह दोनों परिस्थितियों में दृश्य काव्य का मंचन हुआ वर्तमान काल में ही करेगा।

इसलिए दृश्य काव्य के मंच के निर्देश हमेशा वर्तमान काल में ही लिखे जाते हैं क्योंकि

दृश्य काव्य का कभी भी मंचन हो वह वर्तमान काल में ही घटित होगा या खेला जाएगा।

इसके साथ साथ दृश्य काव्य के प्रायः तीन अंग होते हैं –

प्रारंभ

२ मध्य

३ समापन।

इन अंको को ध्यान में रखते हुए भी नाटक को समय के सीमा में बांटना जरूरी हो जाता है।

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निष्कर्ष –

उपरोक्त अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इसे दृश्य काव्य कहा जाता है , क्योंकि इसे रंगमंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

इसका मंचन रंगमंच पर दर्शकों के लिए किया जा सकता है।

कुछ साहित्यकारों ने रंगमंच और दृश्य काव्य पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।

कुछ रंगकर्मियों का मानना है कि रंगमंच , दृश्य काव्य के लिए होता है , तो कुछ का मानना है नाटक रंगमंच के लिए होता है। किंतु अंततोगत्वा पाठक और दर्शक होने के नाते हमारा यह मानना है कि किसी भी दृश्य काव्य को ऐसा होना चाहिए जो रंगमंच पर प्रस्तुत किया जा सके। सफल रंगकर्मी वही है जो सफलतापूर्वक दृश्य काव्य का मंचन रंगमंच पर करें और दर्शकों को उसके मूल भाव से जोड़ सकें।

आशा है यह लेख आपको पसंद आया हो , आपके ज्ञान की वृद्धि हो सकी हो।

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हम यथाशीघ्र आपके प्रश्न का उत्तर देंगे।

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