उपन्यास के तत्व की संपूर्ण जानकारी उदाहरण सहित

उपन्यास आधुनिक युग की देन है। आज के लेख में हम सभी उपन्यास के तत्व पर विस्तृत रूप से लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आप उपन्यास के मूलभूत आधार को भली-भांति जान सकेंगे। निरंतर अभ्यास से आप उपन्यास की रचना भी करने को प्रेरित होंगे।

उपन्यास की रचना इन्ही तत्वों पर ही आधारित होती है।

इस लेख का अध्ययन करने से आप उपन्यास लेखन की समस्त जानकारी हासिल करेंगे।

उपन्यास के तत्व की संपूर्ण जानकारी

उपन्यास आधुनिक काल की देन है, इसका विकास मुद्रण कला के विकास से संभव हो सका। यह बंगला साहित्य में अनुवाद के माध्यम से आया।  उपन्यास का शाब्दिक अर्थ है पास रखा हुआ।

यह दो शब्दों के योग से बना है उप (समीप) + न्यास (थाती) अर्थात पास रखी हुई वस्तु

उपन्यास को पढ़कर व्यक्ति ऐसा महसूस करता है, जैसे उसकी कहानी उसकी भाषा में लिखी गई हो। वह उपन्यास के साथ स्वयं को स्थापित कर लेता है। हिंदी में जहां ‘उपन्यास’ कहा जाता है वही अंग्रेजी में नई विधा होने के कारण इसका नाम ‘नोबेल’ है अन्य भाषाओं में ‘गल्प’ जैसे शब्द भी प्रचलित है। उपन्यास की रचना मुख्यतः सात तत्वों पर आधारित होती है। उपन्यासकार इन तत्वों के माध्यम से एक वृहद उपन्यास की रचना करता है। उपन्यास को लिखते समय उपन्यासकार इन सातों तत्वों से भलीभांति परिचित रहता है।

इसके अभाव में सफल उपन्यास की रचना नहीं की जा सकती।

उपन्यास के प्रमुख तत्व

१ कथावस्तु

२ पात्र

३ संवाद

४ भाषा शैली

५ देशकाल वातावरण

६ रस भाव तथा

७ उद्देश्य है।

प्रचलन में छः तत्व को ही महत्व दिया जाता है, रस भाव का प्रयोग अधिक नहीं किया जाता।

1. कथावस्तु

उपन्यास की यह मूलभूत आवश्यकता होती है। कोई भी उपन्यासकार उपन्यास लिखने से पूर्व उसकी एक कल्पना करता है उसका पूरा खाका तैयार करता है, इसके पश्चात उपन्यासकार अपनी कल्पना को मूर्त रूप देता है।

जिसे साधारण शब्दों में हम कथावस्तु कहते हैं।

उपन्यास को प्रबंध काव्य भी कहा गया है, मूलतः कथाात्मक विधा होने के कारण प्रबंध काव्य में कथावस्तु/कथानक को विशेष महत्व दिया गया है। कथावस्तु/कथानक तैयार करने से पूर्व उपन्यासकार को आवश्यकता होती है कि वह जीवन से संबंधित रोचक प्रसंग, मार्मिक घटना, परिस्थिति आदि जो भी शिक्षाप्रद या प्रेरणादायक हो उन विषय का चयन करें और विस्तृत रूप से इसकी योजना बनाएं।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह होती है कि व्यर्थ तथा नीरस प्रसंगों से कथानक की उपयोगिता व्यर्थ हो जाती है। अतः कथानक को आदि से अंत तक एक सूत्र में पिरो कर चलना चाहिए। कथावस्तु, कथानक सूत्रबद्ध नहीं होने के कारण यह पाठकों से तारतम्यता स्थापित नहीं कर पाता है, जिसके कारण कथानक की उपयोगिता सिद्ध नहीं हो पाती। इसके लिए उपन्यासकार को आरंभ से लेकर अंत तक सभी घटनाओं या प्रसंगों को मुख्य कथा से जोड़ते हुए उसे एक सूत्र में पिरोना चाहिए।

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2. पात्र

उपन्यास का दूसरा प्रमुख अनिवार्य तत्व पात्र है। पात्र के चरित्र चित्रण पर ही संपूर्ण उपन्यास की सफलता निर्भर करती है। उपन्यासकार को पात्रों का चयन करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। उपन्यास में पात्रों की भीड़ इकट्ठी ना हो इसका भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि पात्रों की संख्या अधिक होने पर उन सभी पात्रों के साथ उपन्यासकार न्याय नहीं कर पाएगा। अर्थात सभी पात्रों की भागीदारी ठीक प्रकार से नहीं हो पाएगी।

अतः उपन्यास में पात्रों का चयन सीमित रूप से करना चाहिए।

पूर्व समय में जहां ऐतिहासिक तथा पौराणिक घटनाक्रम को दिखाने के लिए अनेकों अनेक पात्रों की आवश्यकता थी, उपन्यास में ऐसा नहीं है।  इसलिए पात्रों का चयन करते समय सीमित संख्या तथा कथानक के अनुरूप चयन करना चाहिए।

पात्र दो प्रकार के होते हैं –

  • प्रधान पात्र – प्रधान पात्र को उपन्यास का नायक या नेतृत्व करने वाला पात्र कहा जाता है। यह आरंभ से लेकर अंत तक उपन्यास में मौजूद रहता है। इसी पात्र के इर्द-गिर्द सभी घटनाक्रम घटते हैं। सभी घटनाओं आदि का संबंध प्रधान पात्र से होता है।
  • गौण पात्र – यह कथानक को गति देने के लिए बीच-बीच में उपस्थित होते हैं। साथ ही दर्शकों तथा पाठकों को मनोरंजन करने तथा उन्हें और अधिक मजबूती से जुड़ने का कार्य करते हैं। यह बीच-बीच में उपस्थित होकर उपन्यास में उत्पन्न होने वाले बोरियत आदि का समन करते हुए पाठक को जोड़ने का कार्य करते हैं। इनका कार्य बीच में उपस्थित होकर नीरसता को दूर करना होता है।

3. संवाद

संवादों की योजना करते समय उपन्यासकार को सावधानी बरतनी चाहिए। पात्रों के बीच परस्पर वार्तालाप कथानक के अनुरूप होना चाहिए यह वार्तालाप ही पाठकों को जोड़े रखता है। अगर उपन्यास का कथानक ग्रामीण परिवेश से संबंधित है तो पात्रों की बातचीत भी ग्रामीण बोलचाल की भाषा में होनी चाहिए। अगर ग्रामीण परिवेश से विपरीत शब्दावलीयों का प्रयोग किया जाएगा तो पाठक उपन्यास के साथ तारतम्यता स्थापित नहीं कर पाएगा। वह शब्द पाठक को बेमेल सा प्रतीत होने लगेगा और उपन्यास के प्रति उसकी अरुचि उत्पन्न होगी।

अतः उपन्यासकार को संवादों की योजना के समय छोटे संक्षिप्त और बोलचाल की भाषा का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही पात्रों के अनुकूल भाषा की योजना की जानी चाहिए। संवाद पात्रों के चरित्र को भी प्रकट करते हैं, जिस प्रकार पात्र की भाषा या शब्दावली होगी वह उसके वास्तविक चरित्र को भी उद्घाटित करेंगे। इसलिए एक राजा को जहां राजकाज से संबंधित कठोर भाषा का प्रयोग करना चाहिए।

वही एक ब्राह्मण को सुसंस्कृत तथा मृदु भाषा का प्रयोग करना चाहिए।

इससे उनके चरित्र का भी उद्घाटन संवाद के माध्यम से हो सकेगा।

इसके विपरीत किए गए शब्दों या वार्तालाप को के अभाव में अस्वाभाविकता का बोध होने लगेगा।

4. भाषा शैली

उपन्यास का अनिवार्य तत्व भाषा शैली है।

भाषा शैली की योजना करते समय उसमें छोटे-छोटे वाक्य, अलंकार, लाक्षणिकता, व्यंजक, मुहावरेदार, लोकोक्तियां आदि का भरपूर प्रयोग किया जाना चाहिए।

इनके प्रयोग में कथानक का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।

समय और परिस्थिति के अनुरूप भाषा शैली की उपयोगिता होनी चाहिए।

उपन्यास की भाषा प्रभावी तथा पात्रों के अनुकूल होने पर उपन्यास अपने उद्देश्यों की पूर्ति अंततः करता है।

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5. देशकाल वातावरण ( उपन्यास के तत्व )

कथानक के अनुसार उपन्यास में परिस्थिति तथा समय को यथार्थ रूप में चित्रित करना आवश्यक होता है। अगर एक कृषक खेत में कार्य करता हुआ प्रस्तुत हुआ है तो उस समय का वातावरण भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। शब्दों से ऐसे चित्र प्रस्तुत करने चाहिए जैसे वास्तव में कृषक कड़ी मेहनत कर रहा है। वह धूप में पसीने से लथपथ है तथा अभाव के कारण वह कठिन परिश्रम में संलग्न है। इस प्रकार का दृश्य तथा वातावरण प्रस्तुत करने से पाठक स्वतः घटना से जुड़ जाता है।

वह उपन्यास को रुचि के साथ पड़ता है।

प्रेमचंद का गोदान पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि उसमें देशकाल वातावरण का विशेष ध्यान रखा गया है। चाहे वह पंचायतों द्वारा किया गया फैसला, नायक द्वारा कठिन परिश्रम, नायिका के द्वारा विभिन्न प्रकार की चेस्टाएं, संघर्ष सभी दृश्य उपन्यास पढ़ने पर आंखों के समक्ष आ जाते हैं। इस प्रकार उपन्यास एक जीवंत रूप में व्यक्ति पढ़ पाता है।

उपन्यास में देशकाल वातावरण सजीव चित्र प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं।

जिससे युग, देश, धर्म, संस्कृति कथानक आदि को प्रस्तुत किया जाता है।

इसके माध्यम से राजनीति, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि परिस्थितियों को भी यथार्थ रूप में चित्रित किया जा सकता है। इसके माध्यम से पात्रों की वेशभूषा, खानपान, आचार व्यवहार आदि को भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जिसके माध्यम से पाठक उस वातावरण से जुड़ सकें।

अगर युद्ध आदि का दृश्य है तो योद्धाओं को आमने सामने मैदान में होना चाहिए।

इन सभी योजनाओं से सजीव झांकियां देखने को मिलती है।

अतः उपन्यासकार को उपन्यास के सफल योजना के लिए देशकाल वातावरण का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।

6. रस भाव

किसी भी साहित्य का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति के मन मस्तिष्क पर पड़ने वाला प्रभाव है।

किसी भी साहित्य की रचना किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती है। अतः उपन्यासकार को कथानक का अंत किस भाव के साथ करना है उसका विशेष प्रबंध करना चाहिए।

अधिकतर उपन्यास का समापन ‘सुखांत’ होता है।

जिसमें नायक आरंभ से परिश्रम करता है और अंत तक आते वह उन सभी सुखों को प्राप्त कर लेता है जिसके लिए वह जीवन भर संघर्ष करता है। किंतु कुछ सन्यास ‘दुखांत’ भी है जिसमें उपन्यास के अंत में नायक की मृत्यु या उसका दरिद्र हो जाना आदि दिखाया जाता है।

यह पाठकों के मन में खींझ नीरसता आदि का भाव उत्पन्न करता है।

देखने में आया पाठक उन साहित्य को पढ़ना पसंद करते हैं जिसका अंत ‘सुखांत’ के साथ हुआ हो। इसलिए उपन्यासकार को विशेष ध्यान रखना चाहिए की उसके साहित्य का अंतिम रस सुख की अनुभूति कराता हो। कथानक समाज के विशेष मुद्दों से संबंधित हो जिससे पाठक सुविधाजनक रूप से जुड़ सके तथा उपन्यास के कथानक को आत्मसात कर सके।

7. उद्देश्य ( उपन्यास के तत्व )

किसी भी साहित्य की रचना किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए की जाती है।

उपन्यास का क्षेत्र काफी बड़ा है, इसमें कथानक विभिन्न क्षेत्र के हो सकते हैं।

यहां तक की कई उपन्यास एक खिड़की, पेड़, व्यक्ति आदि पर भी आधारित है।

इसलिए इसके कथानक का कोई सीमित दायरा नहीं है।

प्रत्येक उपन्यास या साहित्य की रचना किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती है।

उपन्यासकार को अपने कथानक के उद्देश्यों को सदैव ध्यान रखना चाहिए और आदि से अंत तक उस उद्देश्य की ओर बढ़ते हुए दिखाना चाहिए।

जैसे

एक कृषक अपनी गरीबी तथा अभावग्रस्त जीवन से संघर्ष करते हुए एक सुखमय जीवन को प्राप्त करना चाहता है। तो उस सुख को प्राप्त करने के मार्ग में जितने भी नायक के प्रयत्न होंगे उन सभी को उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग में दिखाना चाहिए। उद्देश्य की प्राप्ति कराकर उपन्यास को समाप्त करना चाहिए। आजकल विभिन्न मुद्दों पर उपन्यास लिखे जा रहे हैं चाहे राजनीतिक हो, संस्कृति हो, धार्मिक हो या सामाजिक किसी भी विषय उपन्यास की रचना की जा रही है।

किंतु उसका मूल उद्देश्य उपन्यास का केंद्र बिंदु होता है।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए नायक संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है।

अंततोगत्वा वह अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर पाठक के मन में एक विचार छोड़ जाता है।

यह विचार पाठक के कल्पनाशील तथा जागृत मन को सोचने विचार विमर्श करने के लिए प्रेरित करता है।

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निष्कर्ष

इस लेख में हमने उपन्यास के तत्व संपूर्ण जानकारी हासिल करी। संक्षेप में कहें तो

उपन्यास आधुनिक युग की देन है, जिसका विकास मुद्रण कला के बाद हुआ। यह मध्यम वर्गीय समाज के लिए महाकाव्य से कम नहीं है। उपन्यास का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके कथानक कोई भी हो सकता है, उपन्यास के पाठक बहुत व्यापक है, यह जनसामान्य तक अपनी पहुंच बनाने में सफल रहा है। पूर्व समय में जहां महाकाव्य की रचना उच्च कुलीन को ध्यान में रखकर किया जाता था। यहां पाठक वर्ग बेहद सीमित हुआ करता था, वही उपन्यास ने सभी को समान दृष्टि से स्वीकारा है तथा इसकी प्रसिद्धि आज जन-जन तक हुई है।

उपन्यास को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस की घटना का संबंध हमारे जीवन से है।

अतः यह पाठकों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हुई। उपन्यास की रचना प्रमुख सात तत्वों पर आधारित होती है। इन्हीं सात तत्वों का प्रयोग कर उपन्यासकार उपन्यास की रचना करते हैं। आशा है यह लेख आपको पसंद आया हो, आपके ज्ञान की वृद्धि हुई हो, संबंधित विषय से प्रश्न पूछने के लिए आप कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं।

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