यमक अलंकार की परिभाषा, उदहारण, भेद

यमक अलंकार की परिभाषा, उदाहरण, भेद ( Yamak alankar definition, types and examples ) सहित इस लेख में अध्ययन करेंगे।बहुत सारे उदाहरणों से आप इस अलंकार को भलीभांति समझ पाएंगे यह लेख विद्यार्थियों के कठिनाई स्तर को ध्यान में रखकर लिखा गया है। साथ ही सभी प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

Yamak Alankar Kise Kahate Hain

यमक अलंकार, शब्दालंकार के अंतर्गत माना जाता है। इसमें शब्दों की आवृत्ति के कारण अर्थ में भिन्नता तथा काव्य में चमत्कार उत्पन्न होने का गुण विद्यमान होता है।

अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं, यमक अलंकार में भी यह गुण विद्यमान है।

यमक अलंकार की परिभाषा

जिस वाक्य या पद में एक ही शब्द की बार-बार पुनरावृत्ति होती है, किंतु हर बार उसका अर्थ भिन्न होता है वहां यमक अलंकार माना जाता है।

दूसरे शब्दों में जाने तो जहां निरर्थक अथवा भिन्न-भिन्न अर्थ वाले सार्थक शब्द की आवृत्ति द्वारा चमत्कार उत्पन्न किया जाता हो वहां यमक अलंकार होता है।

जैसे –

काली घटा का घमंड घटा।

यहां घटा शब्द दो बार प्रयोग हुआ है।

घटा – बादल , घटा – कम होना है

अतः यहां यमक अलंकार माना जाएगा।

लपट झट से रुख जले-जले, नद नदी घट सुख चले-चले।

यहां जले-जले और चले-चले शब्द की आवृत्ति निरर्थक हुई है। अतः यह यमक अलंकार होगा।

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यमक अलंकार के उदाहरण

यमक अलंकार उदहारण अर्थ की भिन्नता
कनक कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाय कनक – सोना , कनक – धतूरा (सोना और धतूरा का नशा सौ गुनी होती है)
पास ही रे हीरे की खान ,खोजता कहां और नादान ? ही रे – होना, हीरे– आभूषण(निकट ही हीरे की खान है फिर भी लोग भटकते हैं)
माला फेरत जुग भया ,फिरा न मन का फेर

कर का मनका डारि दै मन का मनका फेर।

मनका -माला का दाना, मन का – हृदय का(माला फेरते हुए युग बीत गया किंतु मनका फेर नहीं फिरा क्योंकि हृदय और मोतियों के माला का फर्क है)
काली घटा का घमंड घटा घटा– बादल, घटा– कम होना (घनघोर काले बादल का घमंड कम हुआ)
तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती है। बेर– समय , बेर– फल।(तीन समय बेर खाती थी तीन मात्रा में )
जा दिन तै मुख फेरि हरै हँसि ,हेरि हियो जु लिया हरि जू हरि हरि-कृष्ण, हरि-चुराना (जिस दिन से कृष्ण ने मुख फेरा है मेरा हृदय भी चुरा कर ले गए हैं)
कहे कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराए लीनी। बेनी– कवि का नाम , बेनी-चोटी।
लाख-लाख जुगन हिअ हिअ राखल तईयो हिअ जरनि न गेल। हिअ -प्रेमी, हिअ-ह्रदय
तब हार पहार से लागत है, अब आनि के बीच पहार परे। पहार-पर्वत ,पहार-विशाल
तेलनि तुलनि पूँछ जरि ,जरी लंक जराई जरी। जरी-जल गई, जरी-जड़ी हुई
निघटि रूचि मीचु घटी हूँ घटी जगजीव जतीन की छूटी चटी। घटी-घडी, घटी-कम होना।
पच्छी परछीने ऐसे परे परछीने बीर,तेरी बरछी ने बर छीने खलन के परछीने-शस्त्र, परछीने-पंख काटना
तो पर वारौं उरबसी सुनि राधीके सुजान।

तू मोहन के उरवसी हवे उरवसी समान।

उरबसी -ह्रदय में वास ,उरबसी -अप्सरा का नाम (कृष्ण के हृदय में राधा का वास उर्वशी अप्सरा के समान है)
जीवन का अंतिम धेय स्वयं जीवन है। जीवन- श्वास लेता शरीर , जीवन- संघर्ष
लहर-लहर कर यदि चूमे तो, किंचित विचलित मत होना। लहर– तूफान , लहर– संघर्ष
रती-रती सोभा सब रती के सरीर के। रती-शरीर ,रती-सुंदरता,रती-अप्सरा।

यमक अलंकार के भेद

यमक अलंकार के दो भेद माने गए हैं – 1 अभंग पद यमक 2 सभंग पद यमक।

1 अभंग पद यमक –

जब शब्द को बिना तोड़े-जोड़े एक से अधिक बार प्रयुक्त कर विभिन्न अर्थ ज्ञापित किया जाता है, तब अभंग पद यमक अलंकार होता है। जैसे –

कनक, कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाय

उपरोक्त पद में कनक शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसमें शब्द एक जैसा है किंतु अर्थ की भिन्नता है।

2 सभंग पद यमक –

जब शब्द की आवृत्ति तोड़-जोड़कर की जाती है और अर्थ में इस आधार पर भिन्नता प्रकट की जाती है तब सभंग पद यमक अलंकार होता है। जैसे –

कर का मन का डारि के ,मन का मनका फेर।

यहां मनका मन का तीन बार शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसमें तोड़-जोड़कर प्रयोग हुआ है। किंतु उच्चारण की दृष्टि से एक समान अर्थ देता है अतः यह सब अंग पर यमक अलंकार होगा।

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निष्कर्ष

उपरोक्त अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यमक अलंकार में अर्थ की भिन्नता होती है। पूर्व अनुप्रास अलंकार के अध्ययन में हमने पाया था वहां वर्णों की आवृत्ति बार-बार हो रही थी। किंतु यहां शब्दों की आवृत्ति बार-बार हुई है। यह इसकी विशेषता है।

शब्दों की आवृत्ति के साथ-साथ उसके अर्थ में भी भिन्नता होती है। इस अलंकार के दो भेद अभंग पद अलंकार तथा सभंग पद अलंकार है। जिसकी उपरोक्त व्याख्या हमने विस्तृत रूप से प्रस्तुत की है।

आशा है यह लेख आपको पसंद आया हो ,आपके ज्ञान की वृद्धि हो सकी हो।

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