दोपहर का भोजन ( Dophar ka Bhojan Amarkant Class 11 )

प्रस्तुत लेख अमरकांत के द्वारा लिखा गया है जिसमें एक गरीब परिवार का मार्मिक चित्रण किया है। अभावग्रस्त जीवन का यहां जीता जागता उदाहरण देखने को मिलता है। इस लेख में लेखक का जीवन परिचय , पाठ का सार तथा परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास आदि उपलब्ध है।

प्रस्तुत कहानी शहरी मध्यम वर्गीय परिवार की है , जिसमें नौकरी चले जाने के बाद की स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया गया है। यह पाठ लेखक अमरकांत द्वारा लिखा गया है , इन्होंने साहित्य सृजन में मध्यमवर्गीय जीवन को बड़ी ही सूक्ष्मता से दिखाने का प्रयत्न किया है। एक स्त्री की भूमिका तथा उसमें परिवार के मुखिया और अन्य सदस्यों के मानसिक स्थिति आदि का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है।

विधा  – कहानी

कहानीकार – अमरकांत

अमरकांत – जीवन परिचय

जन्म जुलाई सन 1925 को उत्तर प्रदेश के बलिया के भागलपुर ( नगरा )नामक गांव में हुआ। वास्तविक नाम श्रीराम वर्मा था।

रचनाएं –

  • कहानी संग्रह – जिंदगी और जोंक ,
  • देश के लोग ,
  • मौत का नगर ,
  • मित्र मिलन ,
  • कुहासा आदि।

उपन्यास –

  • सूखा पत्ता ,
  • पराई डाल का पंछी ,
  • सुख जीवी ,
  • बीच की दीवार ,
  • काले उजले दिन ,
  • ग्राम सेविका ,
  • इन्हीं हथियारों से आदि।

साहित्यिक विशेषताएं – अमरकांत नई कहानी आंदोलन के प्रमुख कहानीकार हैं। उनके काव्य में चित्रात्मकता देखने को मिलती है।

भाषा शैली – इन्होंने अपनी अधिकांश कहानियों में बोलचाल की सहज सरल भाषा का प्रयोग किया है। प्रसंग व पात्रअनुसार आंचलिक मुहावरों हुआ व शब्दों के प्रयोग से भाषा रोचक व जीवंत बन गई है। कहीं-कहीं तत्सम शब्दों के अतिरिक्त अरबी , फारसी , अंग्रेजी व देशी शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।

वर्णनात्मक शैली को प्रभावी बनाने के लिए संवादों का यदा-कदा प्रयोग भी किया गया है।

 

दोपहर का भोजन पाठ का सार / परिचय

दोपहर का भोजन गरीबी से जूझते एक निम्न मध्यवर्गीय शहरी परिवार की कहानी है। जिसके मुखिया की अचानक नौकरी छूट जाने के कारण परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। परिवार के सदस्यों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हो पा रहा है , पूरे परिवार का संघर्ष भावी  उम्मीदों पर टिका है। सिद्धेश्वरी संकट की इस घड़ी में परिवार के सभी सदस्यों को एकजुट एवं चिंता मुक्त रखने का अथक प्रयास करती है।

वह अपने परिवार को टूटने से बचाने का हर संभव प्रयत्न करती है।

सिद्धेश्वरी तथा मुंशी जी के परिवार में उनके अतिरिक्त उनके तीन पुत्र हैं। इक्कीस  वर्षीय बड़ा बेटा रामचंद्र , अट्ठारह वर्षीय मंझला बेटा मोहन तथा छह वर्षीय छोटा बेटा प्रमोद।  रामचंद्र एक स्थानीय दैनिक समाचार पत्र के दफ्तर में प्रूफ्रेडिंग का काम सीखता है तथा नौकरी की तलाश में है।

मोहन हाई स्कूल के इम्तिहान की तैयारी कर रहा है।

सिद्धेश्वरी पाठ का जीवंत पात्र हे वह अत्यंत अभाव में अपने परिवार की गाड़ी को खींचे जा रही है। परिवार की स्थिति अत्यंत दयनीय होने पर भी वह परिवार को जोड़ने का पूरा प्रयास करती है। परिवार को जोड़े रखने के लिए वह झूठ का सहारा भी लेती है।

उसका अथक प्रयास रहा है कि घर के सभी सदस्यों को सुख पहुंचाए भले ही स्वयं कष्टों में जीती रहे।

वह परिवार के सदस्यों के सामने एक-दूसरे की कमी ना बता कर उनकी बातों को छुपाती है , ताकि किसी भी सदस्य को मानसिक कष्ट ना हो। यह सभी बातें उसके अपार धैर्य को दर्शाती है। सिद्धेश्वरी ने झूठ बोलकर कोई पाप नहीं किया बल्कि परिवार के सदस्यों को एक दूसरे से जोड़े रखा है।

ऐसा झूठ जो किसी भलाई के लिए बोला जाए उसे बोलने में कोई बुराई नहीं है।

घर के सभी सदस्य रामचंद्र , मोहन तथा मुंशी बारी-बारी भोजन के लिए आते हैं। सभी मन ही मन इस वास्तविकता से परिचित है कि घर में पर्याप्त भोजन नहीं है।

वह सभी कुछ ना कुछ बहाना करके आधे पेट ही भोजन करके उठ जाते हैं।

रामचंद्र के भोजन के दौरान सिद्धेश्वरी के मंझले बेटे मोहन की पढ़ाई की झूठी तारीफ करती है। वह मोहन से झूठ-मूठ कहती है कि रामचंद्र उसकी प्रशंसा करता है। मुंशी जी से भी वह झूठ बोलती है कि रामचंद्र उन्हें देवता के समान कहता है। मकान किराया नियंत्रण विभाग के क्लर्क के पद पर उनकी छंटनी हो चुकी है और आजकल मुंशी जी काम की तलाश में है। मुंशी जी भोजन करते समय सिद्धेश्वरी से नजरें चुराती है , उन्हें मालूम है कि घर में भोजन बहुत कम है और वह स्वयं को इस स्थिति का जिम्मेदार मानते हैं।

भोजन के दौरान सिद्धेश्वरी एवं मुंशी जी अन्य की संबंध बातें करते हैं

जैसे बारिश का ना होना , मक्खियों का होना , फूफा की बीमारी तथा गंगा शरण बाबू की लड़की की शादी हालांकि इन बातों का कोई महत्व नहीं है , फिर भी यह सभी बातें पाठ से जुड़ी हुई है यह सभी बातें उनके मन की व्यथा जीवन के अभाव आदि को दर्शाती है। इन बातों को करके शायद वे मूल विषय गरीबी एवं अभाव से बचना चाहते थे तथा अपने दुखों को कम करना चाहते थे।

सिद्धेश्वरी पर्याप्त भोजन ना होते हुए भी सदस्यों से और भोजन लेने का आग्रह करती है , ऐसा करके वह घर के सदस्यों को गरीबी एवं अभाव का एहसास नहीं होने देना चाहती। वह सदस्यों की एक-दूसरे के विषय में झूठी तारीफ करके गरीबी अभावग्रस्त एवं संघर्ष पूर्ण वातावरण में भी उन्हें एकजुट तथा खुशहाल रखने की कोशिश करती है।

सबको भोजन करवाने के पश्चात सिद्धेश्वरी जब स्वयं भोजन करने बैठती है तो उसके हिस्से थोड़ी सी दाल जरा सी चने की तरकारी तथा मात्र एक रोटी आती है। तब उसे अचानक अपने सबसे छोटे पुत्र प्रमोद का ध्यान आता है , जिसने अभी तक भोजन नहीं किया था। वह आधी रोटी तोड़ कर प्रमोद के लिए रख देती है तथा शेष आधी लेकर भोजन करने बैठ जाती है।  पहला ग्रास मुंह में रखते ही उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे जो उसकी विवशता को बयान करते हैं।

 

दोपहर का भोजन – सप्रसंग व्याख्या

 

 मुंशी जी ने पत्नी ……………………………  गुड होगा क्या ?

प्रसंग –

पाठ का नाम – दोपहर का भोजन

लेखक का नाम – अमरकांत

संदर्भ –

प्रस्तुत कहानी गरीबी से जूझ रहे एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है। इस अंश में लेखक ने परिवार के मुखिया की मनोदशा का चित्रण किया है। पत्नी सिद्धेश्वरी जब मुंशी जी से बड़े लड़के की कसम दिलाकर एक चपाती और खाने का आग्रह करती है तब –

व्याख्या –

मुंशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी भाव से देखा क्योंकि वह बेरोजगार थे और घर की स्थिति से भलीभांति परिचित थे। उन्होंने दबी आंख से रसोई की ओर देखा , जैसे सिद्धेश्वरी को बता रहे हो कि उन्हें घर की हालत पता है।  तब अपना और सिद्धेश्वरी का मान बचाते हुए एक अनुभवी गृहस्थ की भांति पत्नी से कहा कि और नमकीन से उसका दिल भर गया है। जबकि वास्तव में उनकी भूख अभी शांत नहीं हुई थी , इसलिए वे शपथ के बहाने पत्नी से गुड़ के बारे में पूछ कर शरबत पीने की इच्छा को भी व्यक्त कर देते हैं।

विशेष –

  • अभावग्रस्त निम्न मध्यवर्गीय गृहस्थ की मनोदशा का सजीव चित्रण
  • शैली संवादात्मा को है तथा प्रभावपूर्ण है
  • भाषा सरल सहज व पात्र अनुकूल है तथा पाठकों को अंत तक बांधे रखने में पूर्ण सक्षम है
  • चित्रात्मक भाषा है। दृश्य जैसे पाठक के समक्ष प्रस्तुत हो जाते हैं
  • लेखक ने सामाजिक जीवन को उसके अनुभवों की यथार्थवादी ढंग से अभिव्यक्ति की है।

 

 

दोपहर का भोजन – प्रश्न अभ्यास उत्तर सहित

प्रश्न 1 सिद्धेश्वरी के झूठ सौ शक्तियों पर भारी है – विवेचना कीजिए

उत्तर – सिद्धेश्वरी का परिवार भयंकर गरीबी से ग्रस्त था , अर्थाभाव अर्थात गरीबी के कारण परिवार के सदस्यों में स्नेह का बंधन कमजोर होता जा रहा था। परिवार को बचाए रखने के लिए वह एक सदस्य के सामने दूसरे के विषय में झूठ बोलती थी , ताकि परिवार में भी खराब ना हो। परिवार के सदस्यों में एक दूसरे के प्रति सम्मान स्नेह एवं निकटता बनी रहे , उसके झूठ परिवार को टूटने से बचाते हैं।

वह झूठ जो कल्याण के काम आए सौ  सत्य ऊपर भारी होता है।

प्रश्न 2  दोपहर का भोजन शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – दोपहर का भोजन कहानी में निम्न मध्यवर्गीय परिवार की गरीबी का मार्मिक चित्रण है। इस परिवार की स्थिति इतनी दयनीय है कि घर में खाने के लिए भी पूरा भोजन नहीं है। इस कहानी का पूरा घटनाक्रम दोपहर के भोजन के समय ही घटित होता है , जो कहानी की मूल संवेदना को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम है। घर के मुखिया के बेरोजगार हो जाने पर परिवार को किस प्रकार एक के बाद एक समस्याओं से जूझना पड़ता है।

दोपहर के समय घर के सभी सदस्य एक के बाद एक घर आते हैं और परिवार की स्थिति और अपने संघर्ष को प्रकार अंतर से व्यक्त कर कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

अतः यह शीर्षक सर्वथा उचित है।

प्रश्न 3 उसने पहला ग्रास मुंह में रखा और तब ना मालूम हुआ कहां से आंखों में टप टप आंसू चुने लगे।

उत्तर – सिद्धेश्वरी एक भारतीय ग्रहणी है , वह घर की सभी समस्याओं को अपने ऊपर लेती है तथा परिवार के अन्य सदस्यों के बीच कटुता नहीं आने देती। घर की आर्थिक दशा खराब है वह कम साधनों में भी परिवार का पेट भरने की कोशिश करती है।  इस काम में उसे बहुत झूठ बोलना पड़ता है उसे इस बात की पीड़ा है कि घर का हर सदस्य आधे पेट भोजन करके पेट भरा होने का नाटक करता है।वह स्वयं भी भूखी यही रहती है इस दर्द को वह किसी दूसरे के समक्ष व्यक्त नहीं कर पाती और वह पीड़ा आंखों से आंसू के माध्यम से निकलती है।

प्रश्न – सिद्धेश्वरी ने अपने बड़े बेटे रामचंद्र से मंझले बेटे के बारे में झूठ क्यों बोला ?

उत्तर – सिद्धेश्वरी परिवार की स्थिति को भलीभांति जानती थी। वह सब को एक साथ जोड़ कर रखना चाहती थी। सभी एक दूसरे के प्रति सकारात्मक विचार रखें और एक दूसरे से मिलते रहे , इसलिए सिद्धेश्वरी ने रामचंद्र से मंझले बेटे मोहन के विषय में झूठ बोला। जिसमें छोटा भाई अपने बड़े भाई के किस तरह तारीफ करता है , आज्ञा मानता है को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न – कहानी के सबसे जीवंत पात्र के चरित्र की दृष्टता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर – कहानी का जीवंत पात्र सिद्धेश्वरी है। मेरे अनुसार सिद्धेश्वरी ही इस कहानी की मुख्य नायिका है।

पूरी कहानी के घटनाक्रम में सिद्धेश्वरी की उपस्थिति रहती है।

दोपहर का भोजन पाठ का नाम होने के कारण पूरा प्रसंग दोपहर के भोजन पर केंद्रित रहता है। भोजन का केंद्र रसोईघर रहता है , रसोईघर का संचालन घर की महिला करती है। इस कहानी में घर की महिला सिद्धेश्वरी है। वह अपने परिवार को एकजुट रखना चाहती है और सबको संतोष भाव के साथ देखना चाहती है। सभी सुखी हो किसी को कोई कष्ट ना हो ऐसी आशा करते हुए वह झूठ बोलने से परहेज भी नहीं करती।  क्योंकि उसके झूठ से उसके घर की भलाई होती है।

लोग कुछ समय के लिए खुश हो जाते हैं।

इसलिए कहानी का जीवंत पात्र सिद्धेश्वरी है।

सिद्धेश्वरी स्वयं कष्ट सहती है , भूखे रहती है किंतु अपने परिवार को कष्ट सहने नहीं देना चाहती। वह सबको भरपेट भोजन कराने की इच्छा शक्ति रखती है।

इसके कारण सिद्धेश्वरी का पत्नी रूप तथा मातृ रूप एक साथ देखने को मिलता है।

प्रश्न – कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे गरीबी की विवषता झांक रही होती है ?

उत्तर – संपूर्ण कहानी में गरीबी और आर्थिक विवषता का झलक देखने को मिलता है। किंतु कुछ प्रमुख प्रसंग निम्नलिखित है –

  • मुंशी जी के फटे – पुराने कपड़े रस्सी पर टांगे होते हैं
  • रसोई घर की हालत संतोषजनक नहीं रहती है
  • भोजन करने सभी व्यक्ति अलग-अलग आते हैं
  • कोई भी व्यक्ति भरपेट भोजन नहीं करता और पेट भर जाने का स्वांग करते हैं
  • सबसे छोटे बेटे का जमीन पर लेटा होना और उसके मुख पर मक्खियों का बसेरा दिखाना
  • सिद्धेश्वरी का झूठ बोलना तथा आधी रोटी और पानी पीकर काम चलाना

उपर्युक्त सभी प्रसंग गरीबी की व्यवस्था दिखाने के लिए काफी है। इन प्रसंगों से घर की आर्थिक स्थिति उजागर होती है।

प्रश्न – सिद्धेश्वरी का एक दूसरे सदस्य के विषय में झूठ बोलना परिवार को जोड़ने का अनथक प्रयास था। इस संबंध में आपके विचार लिखिए।

उत्तर – मेरे अनुसार सिद्धेश्वरी पाठ की नायिका है , वह संपूर्ण कथानक को साथ लेकर चलती है। परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था , ठीक प्रकार से भोजन की व्यवस्था भी नहीं हो पाती थी। गरीबी पूरे घर को सुचारू रूप से चलने नहीं देती थी। सिद्धेश्वरी एक पत्नी और तीन बच्चों की मां होते हुए अपना धर्म निर्वाह करती है। वह अपने पति तथा तीनों बच्चों से कभी-कभी एक-दूसरे की झूठी बढ़ाई करने के लिए झूठ का सहारा लेती है।

जिससे उनके संबंध बने रहे। सभी लोग अपनी बड़ाई सुनकर खुश हो जाते थे , जो सिद्धेश्वरी के लिए संतोष का विषय था। ऐसे ऐसे वह हजार झूठ बोलने को तैयार थी जिससे उसका घर सफलतापूर्वक चल सके , घर के लोग आपस में जुड़े रह सके।

प्रश्न – अमरकांत आम बोलचाल की ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं , जिससे कहानी की संवेदना पूरी तरह उभर कर आ जाती है। कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – अमरकांत ने इस कहानी में सरल और सटीक शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया है। इस कहानी का केंद्र गरीब और दयनीय स्थिति में गुजारा कर रहा एक परिवार होता है। अमरकांत ने अपने शब्दों से इस स्थिति को वर्णन करने में सफलता प्राप्त की है। इस कहानी के शब्द ग्रामीण और विषय के अनुकूल है। रसोईघर की स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने अपने शब्दों के प्रयोग से चित्र उपस्थित किया है। पाठक कहानी पढ़ते समय शब्दों के माध्यम से उस पूरे दृश्य को देखता है और गरीबी की स्थिति से रूबरू हो पाता है। अमरकांत की यह कहानी भाषा के स्तर पर सफल है।

प्रश्न – रामचंद्र , मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी ना लेने के लिए बहाने करते हैं ? उसमें कैसी विवषता है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – दोपहर का भोजन कहानी में यह दर्शाया गया है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ भोजन करने नहीं आता। मुंशी जी , रामचंद्र , मोहन सभी एक-एक करके भोजन करने आते हैं। सभी घर की स्थिति तथा रसोई की स्थिति को भली-भांति जानते हैं। वह जानते हैं घर में खाना कम बना है , वह अपने हिस्से का भोजन बड़े ही चाव से खाते हैं।  कम खाते हुए भी ऐसा दिखावा करते हैं जैसे उन्होंने पेट भर खाया है अब उनसे और नहीं खाया जाएगा। वह जानते हैं अगर और खाना ले लिया तो बाकी घर वाले भूखे रह जाएंगे। इसलिए वह तरह-तरह के बहाने बनाते हैं जिससे उन्हें रोटी और ना लेनी पड़े।

 

व्याख्या अभ्यास कार्य हेतु अनुच्छेद

१ उन्माद की रोगिणी  …………………….. प्रमोद को कुछ हो जाए।

२ सारा घर ………………………………….. कहीं जाना ना हो।

 

दोपहर का भोजन – विचारणीय प्रश्न

1. सिद्धेश्वरी घर के सदस्यों से एक – दूसरे के विषय में झूठ क्यों बोलती है ?

2. मुंशी जी तथा सिद्धेश्वरी की असंबंध बातें कहानी से कैसे संबंध है ?

3. उसने पहला ग्रास मुंह में रखा और तब ना मालूम कहां से उसकी आंखों से टप टप आंसू चुने लगे – इस कथन के आधार पर सिद्धेश्वरी की मनः स्थिति का वर्णन कीजिए।

4. दोपहर का भोजन शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

5.  सिद्धेश्वरी का चरित्र चित्रण कीजिए

6. आशय स्पष्ट कीजिए

  1. वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट गट चढ़ा गई।
  2. यह कहकर उसने अपने मंझले लड़के की और देखा जैसे उसने कोई चोरी की हो।
  3. मुंशी जी ने चने की दानों की और इस दिलचस्पी से दृष्टिपात किया जैसे उनसे बातचीत कर रहे हो।

 

7. घोर गरीबी और अभाव से जूझते परिवार के सदस्यों के बीच एक – दूसरे के प्रति संवेदना और संवाद बनाए रखने के लिए सिद्धेश्वरी क्या प्रयास करती है ? स्पष्ट करें

8.   मुंशी जी द्वारा पैर पसार कर सोने में कौन सा भाव व्यक्त होता है ?

9. रामचंद्र मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी ना लेने के लिए बहाने करते हैं उसमें कैसी भी विवशता है ? स्पष्ट कीजिए।

10.   सिद्धेश्वरी के झूठ सौ शक्तियों पर भारी है , विवेचना कीजिए।

11. दोपहर का भोजन कहानी की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए।

 

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लेखक के शब्द –

दोपहर का भोजन , अमरकांत की कालजई रचना है। इस कहानी में एक गरीब तथा आर्थिक रूप से तंग परिवार की स्थिति का बड़ा ही दर्दनाक और हृदय विदारक वर्णन किया है। आर्थिक स्थिति मजबूत ना होने के कारण एक परिवार किस प्रकार अपनी विपन्नता की जिंदगी जीने के लिए मजबूर होता है , पाठ को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है।

घर की महिला होने के नाते सिद्धेश्वरी सभी सदस्यों के बीच सामंजस्य बनाने का हर संभव प्रयास करती है। इसके लिए वह कभी-कभी झूठ का सहारा भी लेती है , लेकिन यह झूठ किसी के हितों की क्षति नहीं करता , बल्कि एक दूसरे को और करीब लाता है। सिद्धेश्वरी के झूठ परिवार को एक सूत्र में बांधे रखता है।

वह ऐसे हजारों झूठ बोलने के लिए तैयार है जिससे उसका परिवार एकजुट रहे।

घर के सभी सदस्य भोजन करने आते हैं।

दोपहर का भोजन ग्रामीण अंचल में एक साथ बैठने का समय होता है। किंतु इस समय भी सभी सदस्य एक – एक करके भोजन करने आते हैं और सभी अपने रसोईघर की वास्तविक स्थिति से भलीभांति परिचित होते हैं। वह सभी जानते हैं रसोई घर में अधिक भोजन नहीं बना है , वह कम खाकर भी पेट भर जाने का झूठा स्वांग करते हैं। जबकि उनके मन के भीतर और खाने की इच्छा रहती है। वह जानते हैं कि उन्होंने अतिरिक्त भोजन लिया तो घर का कोई सदस्य भूखा रह जाएगा। वह इस प्रकार का पाप नहीं करना चाहते हैं , इसलिए अपने हिस्से का भोजन कर उठ जाते हैं।

पाठ में आर्थिक स्थिति से कमजोर परिवार का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया गया है।

2 thoughts on “दोपहर का भोजन ( Dophar ka Bhojan Amarkant Class 11 )”

  1. दोपहर का भोजन विषय पर इतने अच्छे नोट्स देने के लिए मैं आपको शुक्रिया कहना चाहूंगा. आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप लगभग सारा कोर्स अच्छे से समझा कर लिख रहे हैं जो हम विद्यार्थियों के लिए बहुत फायदेमंद है. इसके लिए मैं आपको दिल से धन्यवाद करता हूं

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