रघुवीर सहाय बसन्त आया कविता – Raghuvir sahay kavita class 12

रघुवीर सहाय आधुनिक कवि थे यह तार सप्तक के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यह  पत्रकार भी थे।

इस लेख में आप रघुवीर सहाय का जीवन परिचय उनकी कविता वसंत आया तथा तोड़ो का व्याख्या , काव्य सौंदर्य तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास आदि को प्राप्त कर सकते हैं।

रघुवीर सहाय वसंत आया कविता व्याख्या सहित

रघुवीर सहाय प्रयोगवाद तथा तार सप्तक के महत्वपूर्ण कवियों में से एक है। तार सप्तक अज्ञेय द्वारा बनाई गई लेखकों की मंडली थी , जिसमें सात  महत्वपूर्ण लेखक थे। उनकी कविता या लेख समाज में होने वाली घटनाओं तथा विकृतियों को उजागर करती है। जो कवि मन समाज में देखता है उसे अपनी कविता के द्वारा प्रकट करता है। किस प्रकार एक साधारण व्यक्ति गरीब होता जा रहा है वही पूंजीपति वर्ग निरंतर पूंजीपति होता जा रहा है।

दोनों के बीच किस प्रकार की खाई बढ़ती जा रही है , जबकि मेहनत और मजदूरी एक गरीब व्यक्ति करता है फिर भी वह गरीब रह जाता है। इन सभी विषयों को रघुवीर सहाय ने अपने कविता तथा लेखनी का अंग बनाया है। शासन और सत्ता से वह सदैव दुखी रहे हैं क्योंकि सत्ता और शासन स्वार्थ पूर्ति का एक साधन बन गया है। इसके प्रति वह निरंतर लिखते रहे हैं।

रघुवीर सहाय का संक्षिप्त जीवन परिचय

जन्म – 9 दिसंबर 1924 उत्तर प्रदेश

शिक्षा – 1951 अंग्रेजी साहित्य से एम.ए

संपादन कार्य –

  • प्रतीक पत्रिका में सहायक संपादक
  • आकाशवाणी के समाचार विभाग में कार्यरत
  • कल्पना पत्रिका का संपादन
  • दिनमान पत्रिका का संपादन

 

रचनाएं –

काव्य संग्रह – सीढ़ियों पर धूप में , आत्महत्या के विरुद्ध , हंसो हंसो जल्दी हंसो , लोग भूल गए हैं।

पुरस्कार –

1984 साहित्य अकादमी पुरस्कार लोग भूल गए हैं – रचना पर

 

साहित्यिक विशेषताएं –

  • नयी कविता के समर्थ कवि
  • जन-जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति
  • मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति
  • अकेलेपन ,  असुरक्षा , फालतूपन , परायापन आदि का चित्रण।
  • भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति।

 

भाषा शैली –

  • काव्य भाषा सटीक , दो टूक और विवरण प्रधान
  • अनावश्यक शब्दों के प्रयास से बचाव
  • तद्भव / देशज शब्दों और क्रियाओं का प्रयोग
  • बिम्बों और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग
  • मुक्त छंद और छंदबद्ध कविताएं
  • व्यंग्यात्मक भाषा
  • कथा या वृतांत का प्रयोग
  • खड़ी बोली

मृत्यु 1990 में

वसंत आया कविता का संक्षिप्त परिचय

इस कविता में कवि ने आधुनिक मानव के प्रकृति से संबंध टूटने पर प्रकाश डाला है। बसंत ऋतु का आना अब अनुभव करने की अपेक्षा कैलेंडर और दफ्तर में छुट्टी हो जाने से जाना जाता है। कवि ने मनुष्य की आधुनिक जीवन शैली व्यंग्य का निशाना बनाया है कि उसका प्रकृति से संबंध नहीं रह गया है।  यह उसके जीवन की विडंबना है।

 

सप्रसंग व्याख्या

और कविताएं पढ़ते ………………………………………….. कि वसंत आया। 

प्रसंग –

कवि – रघुवीर सहाय

कविता – वसंत आया

 

संदर्भ –

कवि को बसंत का आना कैलेंडर से ज्ञात होता है , प्रकृति का सौंदर्य अब उसे आकर्षित नहीं करता। प्रकृति की उपेक्षा पर कवि व्यंग्य करते हुए कहता है कि-

व्याख्या

बसंत के आने का पता उसे कैलेंडर से चल गया है , कविताएं पढ़ते रहने से उसे यह तो पता था कि वसंत ऋतु के आने पर वनों में पलाश के वृक्ष लाल लाल फूल से लद जाते हैं। ये पलाश वृक्ष लाल फूलों से लदे ऐसे लगते हैं मानो , वन धधक – धधक  कर लपट के साथ जल रहे हो। वसंत में आम के वृक्ष बौर के भार से लदकर झुक जाते हैं। वसंत के आने पर केवल पृथ्वी के ही सभी उद्यानों में नहीं , बल्कि इंद्र के नंदनवन में भी विभिन्न प्रकार के सुगंधित फूल खिल जाते हैं। फूलों का रस पीकर भंवरे व कोयल मस्त होकर अपने अपने कार्यों का प्रदर्शन करते हैं। कवि कहता है कि मुझे नहीं पता था कि ऐसा भी दिन आएगा , जब वसंत के आने का पता कलेंडर देखकर या कार्यालय की छुट्टी होने से लगेगा।

विशेष –

  • यह कविता आधुनिक जीवन शैली पर व्यंग्य है
  • वसंत ऋतु के समय प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन हे
  • पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार – दहर-दहर , रंग-रस , अपना-अपना
  • अनुप्रास अलंकार – दहर – दहर दहकेंगे। अपना-अपना
  • बिंबो और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग
  • नई कविता
  • छंद मुक्त रचना
  • खड़ी बोली
  • देशज शब्दों व क्रियाओं का प्रयोग।

काव्य सौंदर्य

ऊँचे तरुवर से गिरे …………………………  फिरकी सी आई चली गई।

भाव सौंदर्य –

कवि कहता है कि बसंत के आने पर सड़कों पर ऊंचे ऊंचे वृक्षों से बड़े-बड़े पीले पत्ते गिरते है। इन सूखे पत्तों पर जब पांव पड़ते हैं तो चरमराने की आवाज आती है। सुबह छह बजे की हवा में ऐसी ताजगी है कि जैसे वह अभी अभी गर्म पानी से स्नान करके आई हो और प्रसन्नता से खिल उठी हो। ऐसी ताजगी भरी हवा फिरकी की तरह गोल गोल घूमती हुई आई और चली गई।

शिल्प सौंदर्य –

कवि – रघुवीर सहाय

कविता – वसंत आया

भाषा – खड़ी बोली

शैली – भावात्मक

छंद – मुक्तक छंद

शब्दावली – तद्भव (देशज)

अलंकार –

  • पुनरुक्ति प्रकाश – बड़े-बड़े
  • उपमा – फिरकी – सी
  • अनुप्रास –  पियराय पत्ते , हुई हवा।

बिम्बयोजना – सफल बिम्ब योजना

छंदकविता – अतुकांत

विशेषणों का सटीक प्रयोग

सार – नई कविता का प्रभाव

रघुवीर सहाय बसन्त आया कविता महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न –  ‘और कविताएं पढ़ते रहने से…………. आम बौर आवेंगे ‘ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – कवी व्यंग्य करता है कि आज लोगों की जीवनशैली ऐसी हो गई है कि मनुष्य का प्रकृति से नाता टूट गया है। ऋतू के बदलने पर प्रकृति में आए परिवर्तन से पता ही नहीं चलता। बसंत ऋतु का ज्ञान उसे कैलेंडर या छुट्टी होने पर हुआ। पुस्तकीय ज्ञान से उसे वसंत ऋतु के सौंदर्य के बारे में पता चला , उसने कभी पलाश के फूलों का सौंदर्य नहीं देखा और ना ही आम के पेड़ पर आते बौरों को देखा।

प्रश्न – वसंत आया कविता में कवि की चिंता क्या है ? उसका प्रतिपाद्य लिखिए।

उत्तर – कवि की चिंता यह है कि आज के मनुष्य का प्रकृति से नाता टूट गया है , ऋतुओं का आना अनुभव की बजाय कैलेंडर से आना जाना माना गया है। सभी को वसंत ऋतु का आना भी कैलेंडर से पता चलता है।  हमारी आधुनिक जीवनशैली ने प्रकृति से प्राप्त होने वाले आनंद से हमें दूर कर दिया है। व्यस्तता के कारण मनुष्य को प्रकृति में होने वाले परिवर्तन का पता ही नहीं चलता। वृक्षों से गिरते पत्ते कुगती कोयल , फूलों के खिलने , शीतल वायु के बहने , पलास के जंगलों से मानव को कोई मतलब नहीं।

प्रश्न – वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली ?

उत्तर वसंत आगमन की सूचना कवि को सड़क पर गिरी हुई सूखी पत्तियां जो पैरों के नीचे आकर कड़कड़ की आवाज करती है , उससे प्राप्त हुई।  तथा कार्यालय में होने वाली छुट्टियों से हुई। कवि साहित्य में इतना व्यस्त हो चुके हैं , अब उन्हें बसंत ऋतु का ज्ञान पुस्तक और साहित्य के माध्यम से मिलता है उन्होंने प्रकृति से अपना संबंध तोड़ लिया है।

प्रश्न – वसंत पंचमी के प्रमुख दिन होने का प्रमाण कवि ने क्या बताया और क्यों ?

उत्तर – कवि जब छोटे थे तब उन्हें बसंत पंचमी आदि का आभास प्रकृति में होने वाले बदलाव से मिल जाया करता था। किंतु अब उन्हें बसंत पंचमी की सूचना कैलेंडर या दफ्तर की छुट्टी से होता है। अर्थात उनका प्रकृति से दूर जाना दिखाया गया है। व्यक्ति अपने जीवन शैली में इतना व्यस्त हो गया है कि अब वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है।  यह आधुनिक जीवन शैली को दर्शाता है जिसमें आज का व्यक्ति प्रकृति के क्रियाकलापों से अनभिज्ञ है।

 

रघुवीर सहाय कविता – ‘तोड़ो’

जैसा कि आपको मालूम है रघुवीर सहाय आधुनिक कविता और तार सप्तक के कवि थे उन्होंने अपने कविता के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को उजागर किया था क्योंकि वह पेशे से पत्रकार भी थे तो उनकी पारखी दृष्टि समाज को देखा करती थी और बुराइयों को उजागर कर उसे समाप्त करने का प्रयत्न किया करती थी।

इस कविता में कवि ने सृजन का संदेश दिया है पुरानी घिसी पिटी परंपरा आदि जो बंधन के रूप में कार्य करती है उससे मुक्ति के लिए प्रेरित किया है। चट्टान और बंजर भूमि आदि को माध्यम बनाते हुए अर्थात उनका सहारा लेते हुए कवि ने मन के बंधन को तोड़कर नई चेतना और नई विचारधारा को अपनाने की ओर संकेत किया है।

 

तोड़ो तोड़ो तोड़ो

यह पत्थर यह चट्टाने

यह झूठे बंधन टूटें 

तो धरती को हम जानें 

सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है

अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है

आधे आधे गाने।

उपर्युक्त पंक्ति में कवि मन रूपी मैदान में जो रूढ़िवादी सोच है , उसको तोड़ने का संकेत कर रहा है। वह कहता है जिस प्रकार बंजर भूमि में चट्टाने हैं , उन सभी को तोड़ो क्योंकि भूमि में , मिट्टी में एक ऐसी शक्ति है जिससे दूब अर्थात फसल की पैदावार हो सकती है।

अर्थात अपने मन में जितने भी विकार हैं उन सभी को निकाल फेंको।

जितने भी ऐसे बंधन है जो आगे बढ़ने में बाधक है , उन सभी को छोड़ो और अपने मन को स्वच्छ निर्मल बनाओ और प्रगति के मार्ग पर निकल जाओ।यहां कवि सृजन की ओर संकेत करता है , उसका किसी से विरोध या विरोधाभास नहीं है।  उसके अनुसार तोड़ने में एक सृजनात्मक शक्ति छुपी हुई है जिसकी और कवि संकेत कर रहा है।

 

तोड़ो तोड़ो तोड़ो

यह ऊसर बंजर तोड़ो

यह चरती परती तोड़ो

सब खेत बनाकर छोड़ो

मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को

हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को

गोड़ो गोड़ो गोड़ो।

कवि का स्पष्ट संकेत है कि अपने मन के भीतर जो खीझ है जो ऊब है यह उसी प्रकार है जैसे बंजर भूमि और चारागाह होते हैं। अपने मन को उन सभी ऊब और खीझ को निकाल कर बाहर फेंको। मन में अच्छे विचार अवश्य आएंगे और प्रसन्नता तथा खुशहाली भी समय के अनुसार अवश्य आएगी।

कवि कहता है उसर और बंजर बन चुकी भूमि को मेहनत और कर्म के माध्यम से खेत बनाकर छोड़ो , जिससे कभी ना कभी उस पर फसल अवश्य आएगी , जिससे खुशहाली आएगी।  स्पष्ट संकेत कवि का यह है कि मन के विकार को निकालकर कर्म और सृजनात्मक राह पर व्यक्ति को चलना होगा।

 

प्रश्न – ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है ?

उत्तर – पत्थर और चट्टान के माध्यम से कवि मन में बसे हुए खीझ और ऊब निकाल कर बाहर फेंकना चाहता है। कवि ने इन सभी प्रतीकों का सहारा लेते हुए व्यक्ति को स्वयं के भीतर बंजर हो चुके मन को हरियाली सृजनात्मक और उन्नति के मार्ग पर लाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

 

प्रश्न – कवि को धरती और मन की भूमि में क्या क्या समानताएं दिखाई पड़ती है ?

उत्तर – कवि का मानना है कि धरती और मन दोनों ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां व्यक्ति अपने कर्म और सृजनात्मक शक्ति से नए विचार नए उत्साह आदि का संचार कर सकता है। उसको ऊपजा सकता है , दोनों ही सृजन का क्षेत्र है।

जिस प्रकार बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है , उसी प्रकार विकृत मन को भी शुद्ध करके उसमें अच्छे विचार और उत्साह का संचार किया जा सकता है।

 

प्रश्न – ‘ ये झूठे बंधन टूटें  , तो धरती को हम जाने ‘। यहां पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर – कवि का स्पष्ट संकेत मन में व्याप्त रूढ़िवादी सोच और परंपरा की ओर है जो व्यक्ति को उन्नति और प्रगति के मार्ग में बाधक होती है। इन बंधनों को अगर तोड़ा जाए तो वास्तविक संचार और उत्साह को प्राप्त किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे बंजर भूमि को मेहनत और परिश्रम से उपजाऊ बनाया जाता है।

 

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